अध्याय 173 - अशांति

मार्गोट का नज़रिया

कोबान के पीछे दरवाज़ा इतनी ज़ोर से धड़ाम से बंद हुआ कि पूरा बाथरूम जैसे काँप उठा।

कुछ पल तक मैं बस वहीं खड़ी रही।

जड़।

साँस अटकी हुई।

उस धमाके की गूंज टाइलों से टकराती हुई ऐसे फैली जैसे गोली चल गई हो, दीवारों से उछलती हुई आकर मेरे पेट में भारी पत्थर की तरह बैठ गई।

फिर सन्नाट...

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